Lahsun Ki Kheti Kaise Karen

Lahsun Ki Kheti Kaise Karen

Lahsun Ki Kheti Kaise Karen: लहसुन एक कंद मसाला फसल है। इसमें एलिसिन नामक तत्व होता है, जिसके कारण इसमें एक विशेष सुगंध और तीव्र स्वाद होता है। सल्फर में पाए जाने वाले यौगिक ही इसके तीखेस्वाद और गंध के लिए उत्तरदायी होते हैं। इसका इस्तेमाल गले तथा पेट सम्बन्धी बीमारियों में होता है। लहसुन की खेती आम तौर पर आंध्रप्रदेश, उत्तरप्रदेश, मद्रास और गुजरात में की जाते है।

लहसुन की एक गांठ में कई कलियाँ पाई जाती है जिन्हे अलग करके एवं छीलकर कच्चा एवं पकाकर स्वाद एवं औषधीय तथा मसाला प्रयोजनों  के लिए उपयोग किया जाता है।

Lahsun Ki Kheti Kaise Karen

लहसुन की खेती के  लिए मौसम और जलवायु

लहसुन की खेती कई प्रकार की जलवायु में की जा सकती ह।  वैसे, लहसुन के लिए गर्मी और सर्दी दोनों कम हो तो बेहतर है, तेज गर्मी और लंबे दिन इसके कंद बनने के लिए अच्छे नहीं हैं, छोटे दिन इसके कंद बनने के लिए अच्छे हैं।

इसकी सफल खेती के लिये 29.35 डिग्री सेल्सियस तापमान 10 घंटे का दिन और 70% आद्रता उपयुक्त होती है|  इसके कंद निर्माण के लिये अच्छे होते है इसकी सफल खेती के लिये 29.35 डिग्री सेल्सियस तापमान 10 घंटे का दिन और 70% आद्रता उपयुक्त होती है 

बल्बों के गठन के लिए लघु दिन बहुत ही अनुकूल होते ह। इसे  1000-1300 मीटर समुंदर तल की ऊचाई पर अच्छी तरह से उगाया जा सकता ह।  

भूमि एवं खेत की तैयारी

इसके लिए उचित जल निकासी वाली चिकनी मिट्टी अच्छी होती है। भारी मिट्टी में इसके कंदों की भूमि वृद्धि संभव नहीं है। मृदा का पी. एच. मान 6.5 से 7.5 उपयुक्त रहता है। दो – तीन जुताइयां करके खेत को अच्छी प्रकार समतल बनाकर  क्यारियां एवं सिंचाई की नालियां बना लेनी चाहिय|

फिर इसमें अच्छी मात्रा में खाद डालें। 100 किलो एन, 50 किलो फास्फोरस, पोटाश और सल्फर प्रति हेक्टेयर डालें। 100 किलो नाइट्रोजन एक बार में खेत में न डालें। रोपण के बाद 35 किग्रा/हेक्टेयर, 30 दिनों के बाद 35 किग्रा/हेक्टेयर तथा 45 दिनों के बाद 30 किग्रा/हेक्टेयर प्रयोग करें।

लहसुन उगाने के लिए मिट्टी

लहसुन की खेती मध्यम  काली से चिकनी बुलाई मिट्टी, जिसमें पोटाष की काफी अच्छी मात्रा  हो अच्छी मानी गई है। लहसुन जमीन के नीचे तैयार होने वाले फसल ह। 

कंदीय फसल होने के कारण भुरभुरी तथा जल निकास वाली भूमि  मानी जाती है। लहसुन की खेती के लिए भरी मृदा उपयुक्त नहीं होते है, क्योंकि इसमें जल निकास उपयुक्त नहीं होने के कारण कन्दो का समुचित विकास नहीं हो पते तथा कंद छोटे रहे जाते है, इस कारण भरी मृदा में लहसुन नहीं लगाना चाहिए। 

लहसुन की किस्मे

  • गोदावरी 

इस उन्नत प्रकार के लहसुन में मध्यम आकार के तराजू 4.35 सेमी व्यास, हल्के गुलाबी से सफेद और 22 से 25 कलियाँ (जबड़े) प्रति कंद होते हैं। फसल बोने के 140 से 145 दिन बाद से लेकर 100 से 105 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होती है।

  • स्वेता 

इस उन्नत पौंड के तराजू आकार में मध्यम, व्यास में 5 से 5.20 सेमी, चांदी-सफेद रंग के होते हैं। प्रत्येक कंद पर 25 से 26 कलियाँ होंगी। फसल की अवधि 130 से 135 दिन है और उपज 100 से 105 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।

  • भीमा ओंकार

इस उन्नत पौंड के कंद मध्यम आकार के ठोस और सफेद रंग के होते हैं। यह किस्म 120 से 135 दिनों में पक जाती है। प्रति हेक्टेयर औसत पैदावार 80 से 140 क्विंटल तक प्राप्त होती है| यह किस्म थ्रिप्स कीट के प्रति संवेदनशील होती है| यह किस्म गुजरात, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली क्षेत्र के लिये उपयुक्त है|

लहसुन की बीज एवं बुवाई

लहसुन की बुवाई हेतु स्वस्थ एवं बडे़ आकार की शल्क कंदो (कलियों) का उपयोग किया जाता है। बीज 5-6 क्विंटल / हेक्टेयर होती है। शल्ककंद के मध्य स्थित सीधी कलियों का उपयोग बुआई के लिए नही करना चाहिए। बुआई पूर्व कलियों को मैकोजेब+कार्बेंडिज़म 3  ग्राम दवा के सममिश्रण के घोल से उपचारित करना चाहिए। लहसुन की बुवाई का उपयुक्त समय ऑक्टोबर -,नवम्बर होता है।

लहसुन को कूड़ेदान, छिड़काव या हटाने की विधि में बोया जाता है। कलियों को 5-7 से.मी. की गहराई में गाड़कर उपर से हलकी मिट्टी से ढक देना चाहिए। बोते समय कलियों के पतले हिस्से को उपर ही रखते है। बोते समय कलियों से कलियों की दूरी 8 से.मी. व कतारों की दूरी 15 से.मी.रखना उपयुक्त होता है। बड़े क्षेत्र में फसल की बोनी के लिये गार्लिक प्लान्टर का भी उपयोग किया जा सकता है।

लहसुन के प्रमुख रोग

  • झुलसा रोग – कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक खराब मौसम के बाद एकाएक तापमान बढ़ने से फसल पर इस रोग ने हमला बोला है। लहसुन की करीब 30 फीसदी फसल झुलसा रोग की चपेट में आ चुकी है।रोग से प्रक्रोप की स्थिति में पत्तियों की उर्ध्व स्तम्भ पर हल्के नारंगी रंग के धब्बे बनते है ।
  • लहसुन का बैगनी धब्बा- यह रोग अल्टेरनेरिया पोरी नमक कबक से होता है।यह रोग पौधों कीकिसी भी अवस्था में आ सकता है।इस रोग में पतियों या पुष्प गुच्छ की डंडियों पर आरंभ  में छोटे, दबे होए, बैगनी केंदर वाले लंबवत सफ़ेद धब्बे बनते है|

लहसुन की रोकथाम एवं नियंत्रण

1 .मैकोजेब+कार्बेंडिज़म 2.5 ग्राम दवा के सममिश्रण से प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार कर     बुआई करें।

2. मैकोजेब 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी या कार्बेंडिज़म 1 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से कवनाशी दवा का 15 दिन के अंतराल पर दो बार छिडकाव करें।

3. रोग रोधी किस्म जैसे जी-50 , जी-1, जी 323 लगावें।

कटाई

खुदाई एवं लहसुन का सुखाना – जिस समय पौधौं की पत्तियाँ पीली पड़ जायें और सूखने लग जाये सिंचाई बन्द कि देनी चाहिए । इसके बाद गाँठो को 3-4 दिनों तक छाया में सुखा लेते हैं। फिर 2 से 2.25 से.मी. छोड़कर पत्तियों को कन्दों से अलग कर लेते हैं । कन्दो को साधारण भण्डारण में पतली तह में रखते हैं। ध्यान रखें कि फर्श पर नमी न हो । लहसुन पत्तियों के साथ जुड़े बांधकर भण्डारण किया जाता है।

छटाई – लहसुन को बाजार या भण्डारण में रखने के लिए उनकी अच्छी प्रकार छटाई रखने से अधिक से अधिक लाभ मिलता है तथा भण्डारण में हानि काम होती है इससे कटे फटे बीमारी तथा कीड़ों से प्रभावित लहसुन छांटकर अलग कर लेते हैं।

Credit: Ghar me Bagicha

निष्कर्ष

लहसुन की खेती के लिए किसान भाइयों को पहले खेत की दो से तीन बार अच्छी तरह जुताई करनी चाहिए। फिर अच्छी मात्रा में खाद डालें| 100  किलो एन,50  किलो फास्फोरस, पोटाश और सल्फर प्रति हेक्टेयर डालें। 100 किलो नाइट्रोजन एक बार में खेत में न डालें। रोपण के बाद 35 किग्रा/हेक्टेयर, 30 दिनों के बाद 35 किग्रा/हेक्टेयर तथा 45 दिनों के बाद 30 किग्रा/हेक्टेयर प्रयोग करें।  

लहसुन आमतौर पर आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश और गुजरात में उगाया जाता है, जिसके लिए एक विशिष्ट जलवायु और मिट्टी की आवश्यकता होती है। इसलिए गर्म और ठंडे क्षेत्रों में इसका उत्पादन अच्छा नहीं होता है। लहसुन को जमीन में या गमले में उगाया जा सकता है और यह मध्य से देर से गर्मियों तक कटाई के लिए तैयार होता है। आजकल मप्र में प्रोसेसिंग के बाद पाउडर, पेस्ट और चिप्स बनाने की प्रोसेसिंग यूनिट लगाई जाती है। जो प्रसंस्कृत वस्तुओं के निर्यात से विदेशी मुद्रा अर्जित करते हैं।

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